बुधवार, 24 जून 2009

मैंने बुलाया था तुझे

मैंने बुलाया था तुझे की आओ,
लहर बन कर
तुम आयी तो समंदर
साथ ले आई .
जो बनाया था घर
किनारे पर मैंने
और देखे थे सपने
की तेरे साथ किसी रोज
बसेरा करूँगा, इधर रहूँगा
तेरे एक ही झटके से
मिल गया फ़िर से
उसी मिटटी में
जिससे मैंने
बनाया था उसे
बड़ी मुस्किल से
-
मुझे यकीन था की एक दिन
तुम जरूर आओगी मगर
यूँ आओगी ये यकीन
अब भी नही होता
तुम लहर हो उया तूफान की
तुझे जन तो था
मगर मेरी हसरतो का करके खून
तुमने बूरा किया

आता तो मुझे भी है
यूँ ही तबाह करना
मैं भी तेरे उमड़ते समंदर को
रोक सकता हूँ
मैं वो भी कर सकता हूँ
कोई झोंका तुझे
छुएगा भी नही
मगर-
प्यार प्यार है
रंजिश नही
तुम लाख तूफान बनके आओ
लाख मेरी हस्ती मिटाओ
मैं खुश हूँ यूँ मिट जाने में
पर एक गुजारिश है
ये मत समझ लेना
मेरी औकात कुछ न थी

आओ, अब कविता लिखते है

करने को जब कुछ ह नहीं
फिर आओ अब कविता लिखते है
बात कही जा सकती है
सूरज को सूरज कह कर भी
सूरज को सविता लिखते है
आओ अब कविता लिखते है
कुछ बात तुम्हारी लिखते है
कुछ बात हमारी लिखते है
कुछ नयी कल्पना करते है
कुछ जीवन बिता लिखते है
आओ, अब कविता लिखते है