बुधवार, 28 अप्रैल 2010

आज हम कस्तियाँ लाते है, तूं तूफान उठाले
जब डूबना ही है तो क्यूँ न एक बार आजमालें
साहिल पर खड़े रहने में कुछ भी लुफ्त नहीं
मैं समंदर में उतर रहा हूँ तूं चाहे तो डुबाले
एक ही रात में ऐसे उलझा दियें है तेरे गेसू
कोंन होगा जो अब ये पेच ओ ख़म निकाले
ये वक़्त की धुल है जिसने धुंधला कर दिया
तरास के तो तूं चाहे मुझे आइना बनाले
हवाओं से की दुश्मनी सिर्फ चिरागों के लिए
मगर जो खुद ही बुझना चाहे उसे कैसे बचालें
'लफ्ज' कुछ चीजें नकाब में हैं अच्छी
तूं चाहे तो रोले चाहे तो मुश्कुराले
आज हम कस्तियाँ लाते है, तूं तूफान उठाले
जब डूबना ही है तो क्यूँ न एक बार आजमालें

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

बहुत परख चुकी अब और इम्तिहान न कर
ऐ जिंदगी इस कदर मुझे परेशां न कर
डोर है, बहुत खींचोगे तो टूट ही जाएगी
हर वक़्त मुझसे खीच-तान न कर
इन नजरों से न लूट चैन किसी का
इन लबों से किसी को बे-ईमान न कर
मुझे जानना है तो आ मेरे दिल में उतर
फक्त मेरे चहरे से मेरी पहचान न कर
मुझे से कोई वडा नहीं किया तो कोई शिकवा नहीं
मगर किसी और से भी कोई जुबान न कर
लूटना है तो दिन-दहाड़े लूट
रात में आ कर मुझे बाद-गुमान न कर
लफ्ज निकलते नहीं है, अब भी तेरा ख्याल करते है
इन रिश्तों को यूँ बदनाम न कर