योवन
नदिया के तट घर था मेरा और नदी से प्यार भी था
नदिया मेरी जीवन-संगीनिनादिया सर-संसार भी था
इठलाती जब चलती थी तब राग उमड़ते थे मन में
कितने कृत-कृत्य थे उस सरिता से वन में
पहाड़ो की बेटी थी ऐसीपर्वत भी थे बहुत मान में
खडे हुए थे अचल मोद में मस्तक ऊँचा आसमान में
फिर बारिश का मोसम आया बादल घटा जोर बरसी
सभी तड़ागा भर आये नदियाँ भी खूब सरसी
नव-योवन आते ही नदिया भूल गयी मर्यादा को
बह निकली पथ छोड़ के अपना, तोड़ के तट की बाधा को
मेरे घर को तोड़ के निकली, जंगल को बर्बाद किया
कितने वृक्ष गिरा डाले कितनो को बेघर बार किया
योवन जोश में वो मेरा प्यार भी भूल गयी
उच्च शिखर की आँख का तारा सब दुलार भी भूल गयी
सब कुछ ऐसा कर बैठी वो जो हम सोच नहीं सकते थे
मगर उफंती उस नदिया को अब हम रोक नहीं सकते थे
धोखा कर के बादल निकले आसमान जब साफ़ हुआ
योवन का शुरूर मिटा तब मोद घमंड सब खाक हुआ
तब नदियाँ के मन में आया हाय वो क्या क्या कर डाला
बर्बाद उसी को कर बैठी जो था मेरा दिलवाला
मगर अभी घर टूट चूका था पेड़ पंछी कुछ रहा नहीं था
बस एक स्तम्भ था मेरे प्यार का खड़ा था अब तक गिरा नहीं था
अब नदिया ने वडा कर के तट में बहने को बोला
उच्च आदर्श को पहचाना और वजन मर्यादा का टोला
फिर मैंने घर बनवाया और अब की बार नदी के बीच
हरा किया फिर वन नदिया ने अपने पवन जल से सींच
लोट आये अब वो दिन वापस लोट आये पंछी अब सारे
नदिया हम को जान से प्यारी नदिया को हम बहुत प्यारे
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1 टिप्पणी:
bahoot achha hai bhai sahab,GOOD GOOD
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