बुधवार, 28 अप्रैल 2010

आज हम कस्तियाँ लाते है, तूं तूफान उठाले
जब डूबना ही है तो क्यूँ न एक बार आजमालें
साहिल पर खड़े रहने में कुछ भी लुफ्त नहीं
मैं समंदर में उतर रहा हूँ तूं चाहे तो डुबाले
एक ही रात में ऐसे उलझा दियें है तेरे गेसू
कोंन होगा जो अब ये पेच ओ ख़म निकाले
ये वक़्त की धुल है जिसने धुंधला कर दिया
तरास के तो तूं चाहे मुझे आइना बनाले
हवाओं से की दुश्मनी सिर्फ चिरागों के लिए
मगर जो खुद ही बुझना चाहे उसे कैसे बचालें
'लफ्ज' कुछ चीजें नकाब में हैं अच्छी
तूं चाहे तो रोले चाहे तो मुश्कुराले
आज हम कस्तियाँ लाते है, तूं तूफान उठाले
जब डूबना ही है तो क्यूँ न एक बार आजमालें

1 टिप्पणी:

jitu ने कहा…

kya baat hai
bahut majbooot kashti banaiyega

bahut khoob janab....aatmsammaan aur aatm swabhimaan ki udahraan...aapki kavita...hum shat shat naman karte hain....