मैंने बुलाया था तुझे की आओ,
लहर बन कर
तुम आयी तो समंदर
साथ ले आई .
जो बनाया था घर
किनारे पर मैंने
और देखे थे सपने
की तेरे साथ किसी रोज
बसेरा करूँगा, इधर रहूँगा
तेरे एक ही झटके से
मिल गया फ़िर से
उसी मिटटी में
जिससे मैंने
बनाया था उसे
बड़ी मुस्किल से
-
मुझे यकीन था की एक दिन
तुम जरूर आओगी मगर
यूँ आओगी ये यकीन
अब भी नही होता
तुम लहर हो उया तूफान की
तुझे जन तो था
मगर मेरी हसरतो का करके खून
तुमने बूरा किया
आता तो मुझे भी है
यूँ ही तबाह करना
मैं भी तेरे उमड़ते समंदर को
रोक सकता हूँ
मैं वो भी कर सकता हूँ
कोई झोंका तुझे
छुएगा भी नही
मगर-
प्यार प्यार है
रंजिश नही
तुम लाख तूफान बनके आओ
लाख मेरी हस्ती मिटाओ
मैं खुश हूँ यूँ मिट जाने में
पर एक गुजारिश है
ये मत समझ लेना
मेरी औकात कुछ न थी
बुधवार, 24 जून 2009
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5 टिप्पणियां:
bahu khub janab.....pyar me mit jaane ki baat to sabhi karte hain....sath ji k dikhao...to jaane....kuch is theme par kuch h to sunao
Awesome man..u really rock...
keep it up and keep updating ur poems here...
I wud like to see more of ur precious poems here..
accha laga ...kafi creative thought hai ...
thanx bharat
tum apne paon ki gard uchalo,
meri kismat pe khak chano;
hamara kya hai,hum to naksh-e-pa hain;
bana karenge, mita karenge.
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